***** For other Fatawa, please click on the topics on the left *****



विषय की सूची

فتاویٰ > व्यवसाय > विरासत का विवरण

Share |
f:1990 -    कर्जदार के देहान्त के पर वारिसों का कर्ज संपादन करना
Country : हैद्राबाद, हिंदुस्तान,
Name : खालिद सिद्दीखी
Question:     आदरणीय मुफती साहब!  मेरे एक मित्र ने मुझ से एक छोटा सा फिक़्ही एवं माननीय व महत्व प्रश्न किया है।  इस युवक ने किसी अवसर पर अपने किसी नाते के भाई से कुछ कर्ज लिया था।  बड़ी ही दुःख एवं तकलीफ से ये बात वर्णन के योग्य है के वह युवक एवं इस की दुल्हन ने भावना में आकर आत्महत्या कर ली।  इन के इश कर्तव्य की बुनियादी कारण घर वालों की ओर से कठोर कतलीफ है जो उन्हें सहन करना पढ़ रहा था।  बहुत ही दुख भरी घटना है, अब इस घटना को बीते हुए लगभग 3 महीने बीत चुके हैं तथा मेरा मित्र अब गंभीर उल्झन का शिकार है।  ये सोंचते हुए के वे कर्ज ली हुई राशि कैसे वापस करे?  एवं वह राशि मृतक के घर वालों को भी नहीं देना चाहता।  ये सोंचते हुए के इस राशि पर इन का सभ्यता से कोई अधिकार नहीं बनता।  मैं नहीं जानता के उस से कुछ फर्क़ पड़ेगा क्यों के ये राशि बहुत छोटी है जब मेरे मित्र ने अपने इस मृतक भाई से पैसे कर्ज लिए थे, मैं शरई, फिक़्ही एवं सभ्यता की अवश्यकता यथा पैसे दान कर देने से भी अनुभव नहीं हुँ।  कृपया बतलाएँ।
............................................................................
Answer:     इसलाम धर्म ने अवश्यकता के लोगों की अवश्यकता के समापन के लिए कर्ज लेन-देन की आज्ञा व दी है।  कर्ज देने की बड़ी सुविधा एवं इस पर पुण्य व सवाब की गवाही सुनाई गई हैं।  

जो व्यक्ति कर्ज प्राप्त किया है उसे कर्ज वापस लौटाने की नीयत रखनी चाहिए।  इस से संसार व परलोक में आनन्द व अल्लाह तआला की प्रसन्नता प्राप्त होते हैं।  इस सिलसिले में हदीस पाक हैः-

भाषांतरः जो व्यक्ति कर्ज प्राप्त करे जबके इस को वापस लौटाने का उद्देश्य रखता हो तो अल्लाह तआला इस की सहायता व मदद करता है।  

(कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्याः 15432)

आप ने कर्ज वापस देने का उद्देश्य रखा है इस नीयत पर भी आप को सवाब व पुण्य मिलेगा।  

कर्जदार की ज़िम्मेदारी है के नियुक्त व निश्चित समय पर अपना कर्ज संपादन करे, चाहे राशि छोटी हो या बड़ी, यदि कर्जदार का देहान्त हो जाए तो इस के वारिसों के हवाले कर दे, क्यों के कर्ज लिया गया धन कर्जदार के जीवन में उसका अधिकार है एवं देहान्त के बाद वारिसों का अधिकार है।  

उपर्युक्त वर्णन के बिना पर कर्जदार के देहान्त के बाद कर्ज की राशि वारिसों के बजाए दुसरों को देना शरन नाजायज़ है।  प्रश्न में वर्णन किए हुए पति-पत्नी को को उन के घर वालों ने जो चिन्तित व दुःख व तकलीफ दी या किसी प्रकार की चोट व हानि पहुँचाया था निस्संदेह वह अत्याचार एवं नाजायज़ कर्म था परन्तु कठिनाई से दिल सहनशील ना हो कर उन का आत्महत्या करना भी बड़ा पाप है एवं अल्लाह तआला नाराज़गी का कारण व माध्यम है।  

{और अल्लाह तआला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है,

मुफती सैय्यद ज़ियाउद्दीन नक्षबंदी खादरी,

महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया,

प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}
All Right Reserved 2009 - ziaislamic.com