नववर्ष का सन्देष - इसलामी दृष्टिकोण
लेखक: हज़रत मौलाना मुफती हाफिज़ सैय्यद ज़ियाउद्दीन नक्षबंदी खादरी,- महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया, प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर
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परिचय

मानव जीवन में समय एक मुख्य सम्पत्ति तथा अनमोल वरदान है।  वही व्यक्ति उन्नति के द्वार पर रहता है जो समय का आदर करता है।  वही समुदाय विकास की सीढ़ी चढती है जो हर पल का सम्मान जानता है।  जो व्यक्ति या दल समय को व्यर्थ करती है समय की रफ्तार इसे विजय व प्रगति की बुलंदी में ढाल देती है। 

 

इसलाम धर्म एक प्राकृतिक व स्वभाविक धर्म है।  इस में इ़बादात की व्यवस्था समय के साथ स्थापित है।  पाँच समय की नमाज़ का संपादन, समय ही से संबंधित है।  इसी लिए हदीस व धर्मशास्त्र की पुस्तकों में नमाज़ के समय की एक स्थायी रुप से वर्णन रखा गया है। 

 

सहर व इफ्तार के लिए बारीकी के साथ समय का ध्यान रखना अवश्य है।  इस में कमी-अधिकता हो जाए तो रोज़ा (उपवास व निराहर व्रत) व्यर्थ हो जाता है।  ज़कात की अवश्य मन्तव्य (फरज़ीयत) के लिए वर्ष (साल) गुज़रना शर्त है। 

 

हज विशेष अयाम (दिन व अवधि) में संपादन कीया जाता है।  क़ुर्बानी के लिए निर्धारित दिन हैं।  इन सम्पूर्ण इ़बादात में समय इस दर्जा महत्व रखता है के यदि इ़बादात के संपादन में इन के निर्धारित समय के अनुसार नारखा जाए तो अनुचित की नौबत तक ही नहीं बल्कि फसाद तक आ जाती है।  

 

इ़बादात के व्यवस्था में समय का संबंध, इसलाम के सिद्धांत में इस की प्रभावित मुस्लिम समुदाय के हर हर सदस्य से समय का आदर व चिन्ता के लिए पूछ रही है। 

 

इसलाम जाति अपने समय के तथा शिष्टाचार व सुनन के साथ व्यवस्था पर कार्यरत (कर्तृवाचक व परिश्रमी) हों तो इसलामी शरीअ़त पर कर्म करने की बरकत तथा समय को अनुमोदन रखने की आदत से इन के कर्म व फिक्र में ऐसी पवित्रता पैदा होगी के जिस राह चलेंगे उन्नति व प्रगति इन के चरन खदम चूमेगी, ऊंची प्रतिष्ठा व उच्च इन के प्रतिक्षारत होंगे। 

 

प्रगति आदम खाकी से सम्हे जाते हैं-

के यह टूटा हुआ तारा ना बन जाए। 

 

(अल्लामा इखबाल) 





 
 
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