ज़कात - इसलाम का स्तम्भ
लेखक: मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी, महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया, प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर
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>> परिचय
>> इ़बादत का लक्ष्य अल्लाह से नज़दीकी तथा निर्माण की सेवा
>> अल्लाह तआ़ला धनवानों के प्रकार ग़रीबों को सम्मानित करने पर सर्वशक्तिशाली
>> ज़कात गरीबों का अधिकारः जो इन्हों लौटाया जाता है
>> ज़कात का संपादन करना ग़रीब पर सहायता नहीं
>> ज़कात के संपादन से धन में बरकत होती है
>> ज़कात संपादन ना करने पर परलोक में शरीर को दाग़ा जाएगा
>> धन- ज़कात संपादन करने पर जहरीला साँप बन कर डसेगा
>> धन ज़कात के साँप बनाए जाने के कारण ?
>> ज़कात का निर्धारित राशि करने सरकार सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम को अधिकार
>> ज़कात किस व्यक्ति पर फर्ज़ है ?
>> ज़कात का धन कैसे लोगों तक पहुंचाना चाहिए ?

 
 
परिचय

 

ज़कात इसलाम का स्तम्भ

 

इसलाम धर्म एक विश्वसम्बन्धी व सर्वगत धर्म है।  जिस में अमन

व शान्ति, चैन व सलामती कि शिक्षा दी जाती है।  यही वह धर्म

है जो आपस में एकता व सत्यनिष्ठा तथा भलाई व शुभचिन्ता का

सन्देश देता है।

 

एक दूसरे के साथ हमदर्दी तथा आपस में मित्रता इसलाम धर्म की

दीप्तिमान विशेषता है।  ऐसे मुहब्बत व प्रेम के मामलात को प्रचार

देते हुए इसलाम धर्म ने ई़मानवालों पर ज़कात फर्ज़ की है। 

ज़कात इस्लाम का 4 स्तम्भ है तथा नमाज़ के बाद सब से

अधिक महत्व व विशिष्ठा इसी को प्राप्त है।

 

क़ुरान करीम में ज़कात का वर्णन 32 स्थान पर नमाज़ के साथ

आया है तथा 15 स्थान पर सदखे का शब्द ज़कात के अर्थ में

शामिल है।  हम इस से आशंका कर सकते हैं के क़ुरान करीम में

नमाज़ के साथ ज़कात का वर्णन आना इस की हैसियत को और

ऊंचा स्तर दे रहा है।





 
 
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